आज तो चलना शुरू किया है, मंजिल की रह पर,
कारवां भी साथ साथ बढ़ने लगा है,
सोचते थे कल तक की ,
मंजिल भी अपनी है और रास्ता भी अपना,
पर जानी है हकीकत आज , की न मंजिल अपनी और न रास्ता अपना.
कठिन परिश्रम की दहलीज तो हर कोई पार करना चाहता है,
सफलता रूपी दुल्हन को हर कोई पाना चाहता है,
पर ये दुल्हन भी बहुत नखरेवाली है,
पहले बहुत नाचती है, तब पास आती है.
ये सफलता श्रींगार बिना ही खूबसूरत लगती है,
श्रींगार जो कर ले तो, धरती पे क़यामत लगती है,
इस दुल्हन को गले से हम भी लगाना चाहते हैं,
पर ये दुल्हन तो हमसे भी शर्मा जाती है.
इस दुल्हन की चाहत दिल से दूर नहीं होती,
इसे चाहने की आदत से ज़िन्दगी बोर नहीं होती,
ये कैसी अनोखी दुल्हन बनायीं है खुदा ने,
जिसे पाकर फिर से पाने की हसरत दूर नहीं होती.
जिसे पाकर फिर से पाने की हसरत दूर नहीं होती....
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