आज हमें अपना और उन्हें अपना देश प्यारा लगता है,
एक साथ मिलकर रहना गवारा लगता है,
कोशिशें जो की थी कभी शरहदों को तोड़ने की,
अब तो उस कोशिश के नाम से ही दर लगता है.
कोई तो होगा जो इन टूटे घरों को जोड़ेगा,
धरती माँ की आँखों से निरंतर बहते आंसू को पोछेगा,
मिलाएगा माँ की बिछड़ी औलादों को,
कोई तो आएगा जो इन शरहदों को तोड़ेगा.
अचानक ही आना हो गया इस ब्लॉग पे. अच्छा लिखा है.
ReplyDeleteशुभकामनाएं!
Thanks Madhuresh! :)
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