Thursday, 22 March 2012

hindustan

आज हमें अपना और उन्हें अपना देश प्यारा लगता है,
एक साथ मिलकर रहना गवारा लगता है,
कोशिशें जो की थी कभी शरहदों को तोड़ने की,
अब तो उस कोशिश के नाम से ही दर लगता है.
कोई तो होगा जो इन टूटे घरों को जोड़ेगा,
धरती माँ की आँखों से निरंतर बहते आंसू को पोछेगा,
मिलाएगा माँ की बिछड़ी औलादों को,
कोई तो आएगा जो इन शरहदों को तोड़ेगा.

2 comments:

  1. अचानक ही आना हो गया इस ब्लॉग पे. अच्छा लिखा है.
    शुभकामनाएं!

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